इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

अगस्त 31, 2008 by

पहली सितंबर को दुष्यंत कुमार को उनके जन्म दिवस पर याद करते हुए कविता कोश आपके लिए लाया है उनकी कालजयी ग़ज़लों के संकलन साये में धूप के साथसाथ उनकी और भी बहुतसी रचनायें।

ग़ज़ल जैसे फ़ारसीउर्दू काव्यरूप के प्रति हिन्दी में एकदम नया वातावरण तैयार कर,हिन्दीग़ज़ल को एक युगान्तर कारी काव्यविधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले दुष्यंत कुमार को भूल पाना जितना असंभव है , उनके जन्म दिवस पर उनका और भी याद आना भी उतना ही स्वाभाविक है। उनका ज़िक्र आते ही मानो अँधेरे में सैंकड़ों चराग़ों की मानिंद बरबस  जगमगा उठते हैं उनकी ग़ज़लों के ऐसे बहुत से शे`र:

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं

अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

हम घर में भटके हैं कैसे ठौरठिकाने आएँगे

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह

पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए

यहाँ  दरख़्तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

यहाँ तक आतेआते सूख जाती हैं कई नदियाँ

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह

ज़िन्दगी ने जब छुआ कुछ फ़ासला रख कर छुआ

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से

मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोड़ासा हाशिया

यह उनके शे`रों के नगीनों, काव्य मोतियों की चमक , चराग़ों की रौशनी का चिर-स्थाई जादू है कि समयसमय पर अधिकांश शे`र ताज़ा मुहावरों की तरह आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग होते हैं और सूक्तियों, दोहों, व चौपाइयों की तरह, उद्धृत किये जाते हैं।

हिन्दी साहित्य के इस  प्रकाशपुंज के चाहने वालों के लिये उनकी रचनायें आज भी ज़िन्दगी की कड़ी धूप में साये की तरह, और ‘जा तेरे स्वप्न बड़े हों’ जैसे आशीर्वाद की तरह हैं।

द्विजेन्द्र ’द्विज’

ज़िंदा रहेंगे फ़राज़

अगस्त 28, 2008 by

फ़राज़ अहमद ‘फ़राज़’ साहब को आँ जहानी कहना एक बेइन्तिहा मुश्किल काम है। उनके प्रशसंक अगर उन्हें याद न करें तो भुलाएँ भी किस तरह? करोड़ों प्रशंसकों के दिलों और दिमाग़ों को अपनी खूबसूरत शायरी से पुरनूर रखने वाले ’फ़राज़’ साहब अब भले ही इस दुनिया को और अपने तमाम चाहने वालों को अलविदा कह गये हों, लेकिन उनके चाहने वालों की आँखों में उनकी यादों के जुगनू आँसू बन कर चमकते ही रहेंगे। अपनी शायरी के करोड़ों मुरीदों के दिलों में, दुनिया के बेहतरीन गायकों की आवाज़ों में, अपनी लासानी शायरी की किताबों में हमेशा तरो ताज़ा रहने वाले आशार के फूलों में और रहती दुनिया तक हर काव्य प्रेमी के ज़ेह्नोदिल में ज़िंदा रहेंगे फ़राज़ साहब. 

कविता कोश टीम दिवंगत आत्मा को अपने श्रद्धासुमन , भाव भीनी श्रद्धांजलि

अर्पित करती है.  
 

फ़राज़ साहब के चंद आशार: 

जब तिरी याद के जुगनू चमके

देर तक आँख में आँसू चमके 

ऐसा गुम हूँ तिरी यादों के बियाबानों में

दिल न धड़के तो सुनाई नहीं देता कुछ भी

 

अब के हम बिछ्ड़ें तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें 

सो रहो मौत के पहलू में फ़राज़

नींद किस वक़्त न जाने आए 
 

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे

ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे 

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते

है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला 

तुम तक़्क़लुफ़ को  भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला. 

पाठक जब चाहें फ़राज़ साहब की अमर शायरी कविता कोश में पढ़ सकते हैं. 
 

सादर

द्विजेन्द्र ’द्विज’ 

एक छोटी—सी लड़ाई

अगस्त 10, 2008 by

इस बार, कविता कोश आपके लिए लाया है बहुतसी अन्य कविताओं के साथसाथ कुमार विकल की कविताएँ। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताओं के ये अंश : 
 

…किन्तु आज जब बचपन अँधेरे कमरे में खोई सूई के समान है

अक्सर अधसोई रातों को

बिस्तर में अर्थहीन सोचा करता हूँ. बायस्कोप 

…जब तक बहता है झरना

और मँडराती है

मेरे जिस्म के आसपास

एक पहाड़ी क़स्बे की गंध

मैं  नहीं अकेला

मैं नहीं निस्संग. एक पहाड़ी यात्रा 

…दुनिया का सबसे सुखी आदमी

सुअर.

और दुखी जानवर

आदमी. शहर का नाम 
 

…दुखी दिनों में आदमी

दिन की रौशनी में रोने के लिये  अँधेरा ढूँढता है

और चालीस की उम्र में भी

माँ की गोद जैसी

कोई सुरक्षित जगह खोजता है. दुखी दिनों में 

…मुझे लड़ना नहीं

किसी प्रतीक के लिए

किसी नाम के लिए

किसी बड़े प्रोग्राम के लिए

मुझे लड़नी है एक छोटीसी लड़ाई

छोटे लोगों के लिए

छोटी बातों के लिए. एक छोटीसी लड़ाई 

 

…ग़लती की शुरुआत यहीं से होती है

जब तुम उनके नज़दीक जाते हो

और कबाड़ी से ख़रीदे अपने कोट को

किसी विदेशी दोस्त का भेजा हुआ तोहफ़ा बतलाते हो. अगली ग़लती की शुरुआत 

…आदमी की अरक्षा की भावना का

मूल स्रोत कहाँ है?

इसके बारे में आपको कोई मनोवैज्ञानिक

या समाजशास्त्री बेहतर बता सकता है.

कवि तो केवल

एक अरक्षित आदमी का बिंब पेश कर करता है. पुल पर आदमी 

कुमार विकल की कविताओं के ये अंश पढ़कर, उनका पूरा कविता संग्रह एक छोटीसी लड़ाई जो हाल ही में कविता कोश में जुड़ा है, आप एक ही साँस में पढ़ जाना चाहेंगे। दिलोदिमाग़ को जकड़ लेने वाली उनकी जादुई कहन के लिए कविता कोश में आपका स्वागत है।

सादर

द्विजेन्द्र ‘द्विज’

लिपट जाता हूँ माँ से — मुनव्वर राना

जुलाई 12, 2008 by

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है
मुनव्वर राना

हिन्दी काव्य के महासागर कविता कोश में पढ़िये सुपरिचित शायर मुनव्वर राना की पुस्तक माँ में संग्रहित के ये अप्रतिम शे’र :

घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

मैदान छोड़ देने से मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो यह ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई

‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती

इन सुन्दर शे`रों की अद्वितीय भाव-प्रवणता और भाव-सम्पन्नता की उद्दात लहरों का आकर्षण आपको इस काव्य कृति के सागर की गहराइयों में बार-बार डुबकी लगाकर ‘माँ’ पर विभिन्न  काव्य मोती निकाल लाने को अवश्य विवश करेगा।

मुनव्वर राना साहब ने यह पुस्तक हर उस बेटे को समर्पित की  है जिसे माँ याद है.

माँ के साथ बुज़ुर्ग, भाई, बहन, बेटी तथा और भी कई विषयों पर मुनव्वर राना के विभिन्न शे`रों का संकलन ‘माँ’ पढ़ने के लिए आइये चलें कविता कोश के महासागर में।

प्रस्तुति

द्विजेन्द्र द्विज

दो साल और दो लाख पन्नें…

जुलाई 5, 2008 by

कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे हो गये हैं। अभी कुछ ही दिन पहले कोश ने दस हज़ार पन्नों के संकलन का आंकडा पार किया था। आज दूसरी वर्षगांठ के अवसर आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि जून 2008 में कविता कोश जालस्थल ने एक महीने में दो लाख पन्नों के देखे जाने का आंकडा भी पार कर लिया। इसका अर्थ है कि अब हर महीने औसतन कविता कोश के दो लाख से भी अधिक पन्ने देखे जाते हैं (प्रतिदिन लगभग 7,000)… यह आकंडे कोश के प्रति पाठकों और रचनाकारों के लगाव का प्रमाण हैं।

पिछले वर्ष कविता कोश में हुई प्रगति पर एक संक्षिप्त आलेख तैयार किया गया है। इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। वर्षगांठ के अवसर पर कोश के लिये एक नया लोगो भी जारी किया गया है।

कविता कोश का नया लोगो

पिछले वर्ष में कविता कोश ने सभी पैमानों पर दुगुनी से अधिक प्रगति की है। इसका ब्यौरा आप आलेख में देख सकते हैं। आशा है कि तीसरे वर्ष के पूरे होने तक कविता कोश आज के इस मुकाम से कहीं आगे होगा।

प्रस्तुति

कविता कोश टीम

टीम में बदलाव

जून 30, 2008 by

कविता कोश टीम में दो बदलाव किये गये हैं। अब प्रतिष्ठा शर्मा कविता कोश की प्रशासक हैं और श्री अनिल जनविजय कोश के संपादक नियुक्त किये गये हैं। इसके अलावा श्री द्विजेन्द्र द्विज को टीम में सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। इसके अलावा टीम पहले की ही तरह है। शीघ्र ही, योगदान के आधार पर, कुछ और व्यक्तियों को सहयोगी सदस्य के रूप में टीम में शामिल किया जाएगा।

वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी

जून 28, 2008 by

कविता कोश में वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की ताज़ा जुड़ी चार कविताओं के अंश:

न वह पत्थर पुरुष है न स्त्री

पत्थर स्त्रीपुरुष नहीं होते

न स्त्रीपुरुष पत्थर होते हैं (पत्थर विमर्श से)

मैं पत्थर के देवता बनाता हूँ

उनकी अमरता नहीं बना पाता

पत्थर के जीवन तक ही रह पाता है पत्थर में

देवता (देव शिल्पी से)

हर एक की चेतना में बैठे आदिम चर्मकार

तुझको नमस्कार ! (असंत वसंत से)

अनजान शहर में अकेली औरत ने

आफ़िस जाती किसी अकेली औरत से

ऐसे पुरुष का पता पूछा

जिसे पूछने वाली के सिवा कोई नहीं जानता (आज का दिन से)

 

आप सादर आमंत्रित हैं कविता कोश में लीलाधर जगूड़ी की इन चारों और इनके अलावा और भी कई कविताओं को  पढ़ने के लिए.

शुभाकांक्षी
द्विजेन्द्र ‘द्विज’

वली दक्कनी

जून 27, 2008 by

वली दक्कनी की १० और ग़ज़लें कविता कोश में जोड़ी गयी। इन उम्दा ग़ज़लों में दक्कन का लहज़ा आसानी से पहचाना जा सकता है। आशा है आपको ग़ज़लें पसंद आएंगी।

यदि आपके पास वली दक्कनी की और रचनाएँ हों तो कृपया कविता कोश टीम से सम्पर्क करें।

–सम्यक

कविता कोश में पढ़िये जीवन और मृत्यु का सत्य

जून 24, 2008 by

डा. मृदुल कीर्ति द्वारा किये गये कठोपनिषद के हिन्दी काव्यानुवाद को अब कविता कोश में पढ़ा जा सकता है। कठोपनिषद नचिकेता के प्रति यम के उपदेश सम्बन्धी आख्यान के लिए प्रसिद्ध है । यह उपनिषद जीवन और मृत्यु के सत्य की विस्तृत व्याख्या करता है।  यह उपनिषद बताता है कि जीवन मे यमराज का साक्षात्कार किये बिना भी साधारण जीव वैराग्य और विवेक तक कैसे पहुँच सकता है।

आशा है कि आपको ये काव्यानुवाद पसन्द आएंगे। अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत ज़रूर करायें।

 

शुभाकांक्षी
प्रतिष्ठा शर्मा
कविता कोश टीम

आपको दस हज़ार शुभकामनाएँ

जून 20, 2008 by

अंतरजाल पर हिन्दी काव्य का एक विशाल कोश देखने का सपना हम सभी के मन में था। आज यह कहा जा सकता है कि यह सपना सच हो चुका है। कविता कोश ने आज दस हज़ार पन्नों का आंकडा भी पार कर लिया। इन पन्नों में नौ हज़ार से भी अधिक हिन्दी काव्य रचनाएँ संकलित हैं। आप सभी को इस उपलब्धि के लिये हार्दिक शुभकामनाएँ।

आज भी मैं वही बात लिखना चाहूँगा -जो मैनें कोश में पाँच हज़ार पन्ने पूरे होने के समय इस ब्लॉग पर लिखी थी; कि

“सितारों के आगे जहाँ और भी हैं”

कविताओं के इस कोश को और भी अधिक विशाल और विविधता से भरपूर बनाने के प्रयास निरन्तर जारी रहेंगे। आप सभी को आपके सहयोग और शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद।

ललित कुमार
कविता कोश टीम