लेखक पुरालेख

कविता कोश की चौथी वर्षगांठ

जुलाई 5, 2010

आज हम कविता कोश की स्थापना का चौथा वर्ष पूरा कर रहे हैं। हिन्दी काव्य का यह ऑनलाइन कोश इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है सामूहिक प्रयासों द्वारा किसी भी कठिन और विशाल लक्ष्य को पाया जा सकता है। कविता कोश साहित्य के भविष्य का भी दर्पण है। इस कोश में संकलन के द्वारा ना केवल दुर्लभ और लुप्त होती कृतियों को बचाया जा रहा है बल्कि ये कृतियाँ सर्व-सुलभ भी हो रही हैं। रचनाकार कविता कोश में अपनी रचनाओं के संकलन के बाद संतुष्टि का अनुभव करते है कि उनकी रचनाएँ समस्त विश्व में पढी़ जा सकती हैं और सुरक्षित व सुसंकलित हैं। इस तीसरे वर्ष में भी कोश तीव्र गति से आगे बढा़। इसी प्रगति की संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है।

    • > 30,000 संग्रहित रचनाएँ
    • > 100,000 आगंतुक हर महीने आते हैं
    • > 1.5 million पन्नें हर महीने देखे जाते हैं
    • > 40 million हिट्स प्रति माह
    • > 3700 फ़ैन्स हैं फ़ेसबुक पर
    • > 80 नियमित योगदानकर्ता
    • > 4500 पंजीकृत प्रयोक्ता

    कविता कोश के विकास में हाथ बंटाने के उद्देश्य से कोश से जुड़ने वाले योगदानकर्ताओं की संख्या इस वर्ष भी निरंतर बढ़ती रही। साथ ही पुराने योगदानकर्ताओं ने भी अपना योगदान बनाये रखा। इस वर्ष कविता कोश टीम में संपादक श्री अनिल जनविजय ने सर्वाधिक योगदान करते हुए कोश में 10,000 पन्नें बनाने का आंकडा पार कर लिया। कोश से नए जुड़े कर्मठ योगदानकर्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह ने तेज़ी से योगदान करते हुए 3000 से अधिक पन्नों का निर्माण किया। कविता कोश टीम के सदस्य श्री द्विजेन्द्र ‘द्विज’ ने ग़ज़ल और नज़्म विधा की रचनाओं को जोड़ने और उर्दू के कठिन शब्दों के अर्थ कोश में शामिल करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रसिद्ध ग़ज़लकारा श्रद्धा जैन अपने पिछले वर्ष के सक्रिय योगदान को आगे बढ़ाते हुए कोश में 1000 पन्नें जोड़ने वाली सातवीं योगदानकर्ता बनीं। अन्य प्रमुख योगदानकर्ताओं में प्रदीप जिलवाने, विभा झलानी, हिमांशु पाण्डेय, राजीव रंजन प्रसाद, अजय यादव, संदीप कौर सेठी, मुकेश मानस, नीरज दइया और वीनस केशरी के नाम शामिल हैं।

    नित नये योगदानकर्ताओं के कोश से जुड़ने का सिलसिला बदस्तूर ज़ारी है। इन सभी योगदानकर्ताओं के श्रम के कारण ही आज कविता कोश अपने वर्तमान स्वरूप को पा सका है। आप भी कोश के विकास दे सकते हैं -इसके लिये नये आगंतुकों का स्वागत देंखें।

    सादर
    प्रतिष्ठा शर्मा
    प्रशासक, कविता कोश टीम

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    हम हुए बीस हज़ारी!

    जुलाई 22, 2009

    आपको यह सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि कविता कोश में उपलब्ध पन्नों की संख्या अब 20,000 के ऊपर पँहुच गयी है। अभी दो सप्ताह पहले ही कोश की स्थापना के तीन वर्ष पूरे हुए हैं। इतने कम समय के दौरान 20,000 पन्नों का संकलन अपने आप में एक उपलब्धि है। यह उपलब्धि इसलिये भी विशेष है क्योंकि कोश में संकलित रचनाकारों का चयन एक कठिन प्रक्रिया के ज़रिये किया जाता है।

    कविता कोश और हिन्दी विकिपीडिया का विकास अंतरजाल पर हिन्दी की उपस्थिति और लोगो के हिन्दी के प्रति प्रेम और लगन को दर्शाता है। यह दोनो ही परियोजनाएँ अब हिन्दी भाषा के परचम को अंतरजाल पर फ़हराने में अग्रणी हो चुकी हैं। दोनो ही परियोजनाएँ सामूहिक प्रयास द्वारा बड़े लक्ष्यों को प्राप्त कर लेने का उत्तम उदाहरण हैं।

    बीस हज़ार पन्नों के आंकडे़ तक पँहुचने के इस अवसर पर कविता कोश अपने सभी योगदानकर्ताओं और कविता कोश टीम के सभी सदस्यों को धन्यवाद देता है। आप सभी की लगन और मेहनत रंग लाई है।

    कविताओं के इस कोश को और भी अधिक विशाल और विविधता से भरपूर बनाने के हमारे प्रयास निरन्तर जारी रहेंगे।

    आप सभी को आपके सहयोग और शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद।

    प्रतिष्ठा शर्मा
    प्रशासक, कविता कोश टीम

    आल्हा … पढिये कविता कोश में!

    फ़रवरी 3, 2009

    आप में से बहुत से व्यक्तियों ने आल्हा रेडियो पर सुना होगा। जिस ऊर्जा और उत्साह के साथ आल्हा और ऊदल की वीर-गाथाओं को हमारे लोक-गायक गाते रहे हैं उससे इस छंद को सुनने का आनंद दूना हो जाता है।

    बहुत समय से पाठकों की यह मांग रही है कि कविता कोश में आल्हा शामिल किया जाये। लेकिन यह छंद कहीं मिल नहीं रहा था। अब आखिरकार श्री योगेन्द्र सिंह के योगदान के कारण भोजपुरी में लिखे गये आल्हा का एक हिस्सा कोश में संकलित हो पाया है। सभी पाठकों की ओर से हम श्री योगेन्द्र सिंह को धन्यवाद देते हैं। इस आल्हा को पढने के लिये यहाँ क्लिक करें

    श्री योगेन्द्र सिंह ने और भी ऐसी रचनाएँ भेजने के लिये कहा है। आप देख सकते हैं कि सभी के द्वारा थोड़ा-थोड़ा योगदान भी इस तरह की अनमोल और दुर्लभ रचनाओं को किस तरह खो जाने से बचा सकता है। आपसे अनुरोध है कि इसी भावना के तहत कविता कोश के विकास में सहायता करें।

    कविता कोश टीम

    गुफ़्तगू अवाम से है

    जनवरी 23, 2009

    शेर मेरे हैं सभी ख़्वास पसंद

    पर मुझे गुफ़्तगू अवाम से हैमीर

    नये वर्ष में इस बार कविता कोश अन्य बहुत-सी रचनाओं के साथ-साथ, यथार्थ और कल्पनाशीलता, परम्परा और आधुनिकता का दुर्लभ संगम प्रस्तुत करते हुए ग़ज़ल को नया मुहावरा प्रदान करने और ग़ज़ल की अर्थवता की वृद्धि में अपना विशिष्ट योगदान देने वाले और सिर्फ़ उँगलियों पर गिनाए जा सकने वाले ग़ज़लकारों में अग्रणी ज्ञानप्रकाश विवेक की बहुत-सी ग़ज़लें जुटा लाया हैतग़ज़्ज़ुल और शेरियत के भरपूर फ़्लेवरों से युक्त उनकी ग़ज़लों के ये शेर देखिए :

    वो कोई और नहीं दोस्तो ! अँधेरा है

    दीया सिलाई जलाकर खड़ा है हँसता हुआ

    पोस्टर सारे पुराने हो गये माहौल के

    जाने कब बदली हुई आबो-हवा लाएँगे लोग

    मोम की तार में अंगारे पिरो दूँ यारो

    मैं भी कर गुज़रूँ कोई काम दिखाने वाला

    वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारो !

    इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

    हवाएँ पूछती फिरती हैं नन्हे बच्चों से

    ये क्या हुआ कि पतंगें उड़ाना छोड़ दिया

    पेश करते हैं दुख को शगल की तरह

    चैनलों को न जाने ये क्या हो गया

    अलमारी में रख आओ गये वक़्त की एलबम

    जो बीत गया उसको भुला क्यों नहीं देते

    ज्ञानप्रकाश विवेक की और भी बहुत-सी ग़ज़लें पढ़िए कविता कोश में हाल ही जुड़े  उनके ग़ज़ल संग्रह गुफ़्तगू अवाम से है में , अभी , इसी वक़्त।

    नव वर्ष के लिए मंगल कामनों सहित

    सादर

    द्विजेन्द्र “द्विज”

    जग-मग ज्योतिपर्व

    अक्टूबर 28, 2008
    कविता कोश की ओर से आपको, आपके परिवार और सभी मित्रगणों को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    पग-पग पे ‘तम’ को हरती हों दीप-श्रृंखलाएँ
    जीवन हो  एक उत्सव,  पूरी हों कामनाएँ

    आँगन में अल्पना की चित्रावली मुबारिक
    फूलों की, फुलझड़ी की, शब्दावली मुबारिक

    ‘तम’ पर विजय की सुन्दर दृश्यावली मुबारिक
    दीपावली मुबारिक, दीपावली मुबारिक

    -द्विजेन्द्र द्विज

    कविता कोश में सुरेश चन्द्र “शौक़” का ग़ज़ल संग्रह “आँच”

    सितम्बर 20, 2008

    कविता कोश हमेशा आपके लिये उत्कृष्ट काव्य जुटाता रहा है। कविता कोश मे हाल ही में श्री सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ की ग़ज़लें संकलित हुई हैं।

    ‘तेरी खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे’ जैसी नज़्म के  सुप्रसिद्ध शायर श्री राजेन्द्र नाथ रहबर ने श्री सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ के ग़ज़ल संग्रह “आँच” की भूमिका में लिखा है :

    ” सुरेश चंद्र ‘शौक़’ साहिब की शायरी किसी फ़क़ीर द्वारा माँगी गई दुआ की तरह है जो हर हाल में क़बूल हो कर रहती है. ”

    सुरेश चंद्र शौक़ साहिब के ये शेर देखिए :

    ज़ियादा चुप ही रहे वो कभी— कभी बोले

    मगर जो बोले तो ऐसे कि शाइरी बोले
    इतने भी  तन्हा थे दिल के कब दरवाज़े

    इक दस्तक को तरस रहे हैं अब दरवाज़े
    शहर फूँकने वालो ! यह ख़याल भी रखना

    दोस्तों के घर भी हैं दुश्मनों की बस्ती में
    इस दौरे—सियासत में हर कोई ख़ुदा ठहरा

    रखिए भी तो किस किस की दहलीज़ पे सर रखिए
    तू वो न देख दिखाती है अक़्स जो दुनिया

    तू देख वो जो दिखाता है आइना दिल का
    आशा है आपको यह प्रस्तुति पसंद आएगी और आप इन ग़ज़लों का आनंद उठाएंगे।

    द्विजेन्द्र द्विज

    इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

    अगस्त 31, 2008

    पहली सितंबर को दुष्यंत कुमार को उनके जन्म दिवस पर याद करते हुए कविता कोश आपके लिए लाया है उनकी कालजयी ग़ज़लों के संकलन साये में धूप के साथसाथ उनकी और भी बहुतसी रचनायें।

    ग़ज़ल जैसे फ़ारसीउर्दू काव्यरूप के प्रति हिन्दी में एकदम नया वातावरण तैयार कर,हिन्दीग़ज़ल को एक युगान्तर कारी काव्यविधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले दुष्यंत कुमार को भूल पाना जितना असंभव है , उनके जन्म दिवस पर उनका और भी याद आना भी उतना ही स्वाभाविक है। उनका ज़िक्र आते ही मानो अँधेरे में सैंकड़ों चराग़ों की मानिंद बरबस  जगमगा उठते हैं उनकी ग़ज़लों के ऐसे बहुत से शे`र:

    कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता

    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

    अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

    घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

    रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं

    अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

    मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

    हम घर में भटके हैं कैसे ठौरठिकाने आएँगे

    हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

    इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

    पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह

    पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए

    यहाँ  दरख़्तों के साये में धूप लगती है

    चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

    जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

    मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

    यहाँ तक आतेआते सूख जाती हैं कई नदियाँ

    मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

    मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह

    ज़िन्दगी ने जब छुआ कुछ फ़ासला रख कर छुआ

    मत कहो आकाश में कुहरा घना है

    यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

    मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से

    मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोड़ासा हाशिया

    यह उनके शे`रों के नगीनों, काव्य मोतियों की चमक , चराग़ों की रौशनी का चिर-स्थाई जादू है कि समयसमय पर अधिकांश शे`र ताज़ा मुहावरों की तरह आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग होते हैं और सूक्तियों, दोहों, व चौपाइयों की तरह, उद्धृत किये जाते हैं।

    हिन्दी साहित्य के इस  प्रकाशपुंज के चाहने वालों के लिये उनकी रचनायें आज भी ज़िन्दगी की कड़ी धूप में साये की तरह, और ‘जा तेरे स्वप्न बड़े हों’ जैसे आशीर्वाद की तरह हैं।

    द्विजेन्द्र ’द्विज’

    लिपट जाता हूँ माँ से — मुनव्वर राना

    जुलाई 12, 2008

    लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
    मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है
    मुनव्वर राना

    हिन्दी काव्य के महासागर कविता कोश में पढ़िये सुपरिचित शायर मुनव्वर राना की पुस्तक माँ में संग्रहित के ये अप्रतिम शे’र :

    घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
    मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है

    इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
    माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

    अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
    मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

    मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
    माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

    मैदान छोड़ देने से मैं बच तो जाऊँगा
    लेकिन जो यह ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई

    ‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
    जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती

    इन सुन्दर शे`रों की अद्वितीय भाव-प्रवणता और भाव-सम्पन्नता की उद्दात लहरों का आकर्षण आपको इस काव्य कृति के सागर की गहराइयों में बार-बार डुबकी लगाकर ‘माँ’ पर विभिन्न  काव्य मोती निकाल लाने को अवश्य विवश करेगा।

    मुनव्वर राना साहब ने यह पुस्तक हर उस बेटे को समर्पित की  है जिसे माँ याद है.

    माँ के साथ बुज़ुर्ग, भाई, बहन, बेटी तथा और भी कई विषयों पर मुनव्वर राना के विभिन्न शे`रों का संकलन ‘माँ’ पढ़ने के लिए आइये चलें कविता कोश के महासागर में।

    प्रस्तुति

    द्विजेन्द्र द्विज

    दो साल और दो लाख पन्नें…

    जुलाई 5, 2008

    कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे हो गये हैं। अभी कुछ ही दिन पहले कोश ने दस हज़ार पन्नों के संकलन का आंकडा पार किया था। आज दूसरी वर्षगांठ के अवसर आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि जून 2008 में कविता कोश जालस्थल ने एक महीने में दो लाख पन्नों के देखे जाने का आंकडा भी पार कर लिया। इसका अर्थ है कि अब हर महीने औसतन कविता कोश के दो लाख से भी अधिक पन्ने देखे जाते हैं (प्रतिदिन लगभग 7,000)… यह आकंडे कोश के प्रति पाठकों और रचनाकारों के लगाव का प्रमाण हैं।

    पिछले वर्ष कविता कोश में हुई प्रगति पर एक संक्षिप्त आलेख तैयार किया गया है। इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। वर्षगांठ के अवसर पर कोश के लिये एक नया लोगो भी जारी किया गया है।

    कविता कोश का नया लोगो

    पिछले वर्ष में कविता कोश ने सभी पैमानों पर दुगुनी से अधिक प्रगति की है। इसका ब्यौरा आप आलेख में देख सकते हैं। आशा है कि तीसरे वर्ष के पूरे होने तक कविता कोश आज के इस मुकाम से कहीं आगे होगा।

    प्रस्तुति

    कविता कोश टीम

    टीम में बदलाव

    जून 30, 2008

    कविता कोश टीम में दो बदलाव किये गये हैं। अब प्रतिष्ठा शर्मा कविता कोश की प्रशासक हैं और श्री अनिल जनविजय कोश के संपादक नियुक्त किये गये हैं। इसके अलावा श्री द्विजेन्द्र द्विज को टीम में सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। इसके अलावा टीम पहले की ही तरह है। शीघ्र ही, योगदान के आधार पर, कुछ और व्यक्तियों को सहयोगी सदस्य के रूप में टीम में शामिल किया जाएगा।