आल्हा … पढिये कविता कोश में!

by

आप में से बहुत से व्यक्तियों ने आल्हा रेडियो पर सुना होगा। जिस ऊर्जा और उत्साह के साथ आल्हा और ऊदल की वीर-गाथाओं को हमारे लोक-गायक गाते रहे हैं उससे इस छंद को सुनने का आनंद दूना हो जाता है।

बहुत समय से पाठकों की यह मांग रही है कि कविता कोश में आल्हा शामिल किया जाये। लेकिन यह छंद कहीं मिल नहीं रहा था। अब आखिरकार श्री योगेन्द्र सिंह के योगदान के कारण भोजपुरी में लिखे गये आल्हा का एक हिस्सा कोश में संकलित हो पाया है। सभी पाठकों की ओर से हम श्री योगेन्द्र सिंह को धन्यवाद देते हैं। इस आल्हा को पढने के लिये यहाँ क्लिक करें

श्री योगेन्द्र सिंह ने और भी ऐसी रचनाएँ भेजने के लिये कहा है। आप देख सकते हैं कि सभी के द्वारा थोड़ा-थोड़ा योगदान भी इस तरह की अनमोल और दुर्लभ रचनाओं को किस तरह खो जाने से बचा सकता है। आपसे अनुरोध है कि इसी भावना के तहत कविता कोश के विकास में सहायता करें।

कविता कोश टीम

Advertisements

6 Responses to “आल्हा … पढिये कविता कोश में!”

  1. हिमांशु Says:

    हमारी लोक सम्पदा का संरक्षण आवश्यक है हमारे लिये. इस दिशा में कविता-कोश का यह कदम सराहनीय है. आभार

  2. ranjana Says:

    Bahut bahut aabhaar…..

  3. ganesh priye dadhich Says:

    dhero sadhuwad aap sb ko kavita kosh ki mahnti teem ko …aap se ye sb pa k aap ko kya btaye k kittni khushi ho rahi ha g lbjo me byan kase kre… g ..mera dil smjhta ya jisko AALHA UDAL KI VIRTA K Kisse pasand ha….. bahut bahut dhayawad g

  4. RATNESH JAWRE Says:

    ITS INTERESTING HISTORY
    THE SITE WORKED BEST IN THIS WAY TO DO THIS

  5. bhartiya Says:

    Aalha bhojpuri nahi hai bundeli bhasha mai hai, krapya galat jaankaari dekar bhramit naa kare

  6. Hareram Rai Says:

    श्री विश्राम राय.में एक सम्पन्य किसान परिवार में लगभग हुआ था ,आप के पूर्वजो संकरवारो वंश ने 7 मार्च 1527 खनवा के युध्य में संकरवारो ने सर्वखाप-पंचायतों की तरह से राणा सांगा की सहायता नहीं किये बल्कि ये तो राणा सांगा के राज्य के हिस्से थे। बाबर ने युध्य के बाद संकरवारो के पूरी बस्सी को न सिर्फ उजाड़े बल्कि उसी स्थान पर अपना पड़ाव भी डाल लिये। बाबर को पता था की ये लोग मेरे गुलामी कबूल नहीं करे गे और मेरे खिलाफ बार- बार उग्र बिरोध करे गे। और उसका अनुमान भी सही निकला 1928 में मदारपुर में भूमिहार ब्रामणो ने बाबर को धेर लिया इतिहास का सबसे बड़ा रक्त पात इस युध्य में हुआ मगर इतिहासकारो ने चुप्पी साध लिये। 1530 में काम देव मिश्र और धाम देव मिश्र ने सकराडीह को आबाद किया.

    कारण मानसिंह राय परशुराम राय के कारण संकरवारो के नाम,यस ,कृति नदी की बाढ़ की तरह फैलने लगीं और संकरवार की शक्ति दूज के चॉँद से बढ़कर पूरनमासी का चॉँद हो गई। मानसिंह राय परशुराम राय यह दोनों वीर कभी चैन से न बैठते थे। रणक्षेत्र में अपने हाथ का जौहर दिखाने की उन्हें धुन थी। सुख-सेज पर उन्हें नींद न आती थी। और वह जमाना भी ऐसा ही बेचैनियों से भरा हुआ था। उस जमाने में चैन से बैठना दुनिया के परदे से मिट जाना था। बात-बात पर तलवांरें चलतीं और खून की नदियॉँ बहती थीं। यहॉँ तक कि शादियाँ भी खूनी लड़ाइयों जैसी हो गई थीं। लड़की पैदा हुई और शामत आ गई। हजारों सिपाहियों, सरदारों और सम्बन्धियों की जानें दहेज में देनी पड़ती थीं । लेकिन संकरवारो ने कभी अपने शादी के लिये ,किसी का डोरा के लिये कही किसी के साथ युध्य नहीं किये और ना ही किसी का धन लूटने के लिये कोई युध्य किये। ये तो वोरो की आर्य जाती है, जो अपनी मान मर्यादा देश की एकता अखण्ड़ता एवं धर्म रक्षा के मर मिटने को तैयार रहते है। और इसी लिये मर मिटे भी है। और ये भी सही है की हमेशा राज्य के सीमा पर ही रहते थे। जहा भी सबसे मुश्किल और खतरनाक राज्य की सिमा होती थी जहा से दुश्मनो का भय सदैव रहता थे राजा लोग वही इन लोगो को रहने की बेवस्था करते थे चाहे वो फतेहपुर सिकड़ी हो या सकरडीह। पृथ्वीराज चौहान के परम मित्र संजम भी महोबा की इसी लड़ाई में मारे गए थे जिनको आल्हा उदल के सेनापति बलभद्र तिवारी जो कान्यकुब्ज और कश्यप गोत्र के थे उनके द्वारा मारा गया था l वह शताब्दी वीरों की सदी कही जा सकती है।कुतलू के युध्य में सीरसिंह राय के मरने के बाद लोगो में सलाह मशिवरा होने लगा लोग तरह तरह की बाते करने लगे। माना गया की झाड़ू से कही आधी नहीं रूकती है आगे का कार्य करिये । ,कुतलू को मरने का जिम्मा मानसिंह राय को सौंपा गया और परशुराम राय को बाहर का भार सौंपा गया । एक सोची समझी रणनीति थी और यही हुआ . कुतलू ने शेर व पहलवान को पाले थे और उसको लगा की मै तो पूरी तरह से सुरक्षित हु लेकिन परशुराम राय ने दोनों शेरो को उलझाकर मार डाले और उसी समय मानसिंह राय कुतलू को अन्दर जाकर उनकी पत्नी व परिवार के सामने युध्य में मार डाले तलू उसिया सेवराई जमनिया परगना का माना जाना एक जागीरदार थे। जिनका दबदबा न सिर्फ
    उसिया सेवराई कत ही बल्कि उत्तर दिशा में आज के करीमुद्दीन पुर कैरइल क्षेत्र जिला गाज़ीपुर तक था।
    जो अपनी निरंकुशा व बल के कारण अन्य लोगो पर जुल्म किया करते थे। जिनका हल उसिया सेवराई से शुरू होता तो आज के करीमुद्दीन पुर कैरइल क्षेत्र में जाकर पानी पीकर वापस आता। जहा तक हल जाता उस जमीन को कुतलू अपना मानते व अधिकार दर्शाते थे। उनके कार्य शैली से आम जान में आक्रोश था। उनका हल शेरपुर के होकर भी जाता था लेकिन जब शेरपुर के लोगो ने उनका अधिकार का खंडन किये और उनकी गुलामी पसन्द नहीं किये तो कुतलू आग बबूला हो कर शेरपुर के लोगो के अधिकृत भू- भाग का हनन करने लगे। जिसका शेरपुर के आम जान ने बिरोध किया। अन्त में उसिया सेवराई और करीमुद्दीन पुर के बीच से शेरपुर को हटाने की ठान लिये और तरह- तरह से परेशान करने लगे। जिनको रोकने के लिये सीरसिंह राय के साथ प्रथम युध्य का बिबरण मिलता है। जिसमे सीरसिंह रायशहीद हो गये थे। केवर
    बिबरण ही नहीं बल्कि लोक कथााओं में भी प्रचलित है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: