August 10, 2008 by pratishtha
इस बार, कविता कोश आपके लिए लाया है बहुत—सी अन्य कविताओं के साथ—साथ कुमार विकल की कविताएँ। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताओं के ये अंश :
…किन्तु आज जब बचपन अँधेरे कमरे में खोई सूई के समान है
अक्सर अधसोई रातों को
बिस्तर में अर्थहीन सोचा करता हूँ. बायस्कोप
…जब तक बहता है झरना
और मँडराती है
मेरे जिस्म के आसपास
एक पहाड़ी क़स्बे की गंध
मैं नहीं अकेला
मैं नहीं निस्संग. एक पहाड़ी यात्रा
…दुनिया का सबसे सुखी आदमी—
सुअर.
और दुखी जानवर
आदमी. शहर का नाम
…दुखी दिनों में आदमी
दिन की रौशनी में रोने के लिये अँधेरा ढूँढता है
और चालीस की उम्र में भी
माँ की गोद जैसी
कोई सुरक्षित जगह खोजता है. दुखी दिनों में
…मुझे लड़ना नहीं —
किसी प्रतीक के लिए
किसी नाम के लिए
किसी बड़े प्रोग्राम के लिए
मुझे लड़नी है एक छोटी—सी लड़ाई
छोटे लोगों के लिए
छोटी बातों के लिए. एक छोटी—सी लड़ाई
…ग़लती की शुरुआत यहीं से होती है
जब तुम उनके नज़दीक जाते हो
और कबाड़ी से ख़रीदे अपने कोट को
किसी विदेशी दोस्त का भेजा हुआ तोहफ़ा बतलाते हो. अगली ग़लती की शुरुआत
…आदमी की अरक्षा की भावना का
मूल स्रोत कहाँ है?
इसके बारे में आपको कोई मनोवैज्ञानिक
या समाजशास्त्री बेहतर बता सकता है.
कवि तो केवल
एक अरक्षित आदमी का बिंब पेश कर करता है. पुल पर आदमी
कुमार विकल की कविताओं के ये अंश पढ़कर, उनका पूरा कविता संग्रह एक छोटी—सी लड़ाई जो हाल ही में कविता कोश में जुड़ा है, आप एक ही साँस में पढ़ जाना चाहेंगे। दिलो—दिमाग़ को जकड़ लेने वाली उनकी जादुई कहन के लिए कविता कोश में आपका स्वागत है।
सादर
द्विजेन्द्र ‘द्विज’
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July 12, 2008 by kavitakosh
लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है —मुनव्वर राना
हिन्दी काव्य के महासागर कविता कोश में पढ़िये सुपरिचित शायर मुनव्वर राना की पुस्तक माँ में संग्रहित के ये अप्रतिम शे’र :
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मैदान छोड़ देने से मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो यह ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई
‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती
इन सुन्दर शे`रों की अद्वितीय भाव-प्रवणता और भाव-सम्पन्नता की उद्दात लहरों का आकर्षण आपको इस काव्य कृति के सागर की गहराइयों में बार-बार डुबकी लगाकर ‘माँ’ पर विभिन्न काव्य मोती निकाल लाने को अवश्य विवश करेगा।
मुनव्वर राना साहब ने यह पुस्तक हर उस बेटे को समर्पित की है जिसे माँ याद है.
माँ के साथ बुज़ुर्ग, भाई, बहन, बेटी तथा और भी कई विषयों पर मुनव्वर राना के विभिन्न शे`रों का संकलन ‘माँ’ पढ़ने के लिए आइये चलें कविता कोश के महासागर में।
प्रस्तुति
–द्विजेन्द्र द्विज
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July 5, 2008 by kavitakosh
कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे हो गये हैं। अभी कुछ ही दिन पहले कोश ने दस हज़ार पन्नों के संकलन का आंकडा पार किया था। आज दूसरी वर्षगांठ के अवसर आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि जून 2008 में कविता कोश जालस्थल ने एक महीने में दो लाख पन्नों के देखे जाने का आंकडा भी पार कर लिया। इसका अर्थ है कि अब हर महीने औसतन कविता कोश के दो लाख से भी अधिक पन्ने देखे जाते हैं (प्रतिदिन लगभग 7,000)… यह आकंडे कोश के प्रति पाठकों और रचनाकारों के लगाव का प्रमाण हैं।
पिछले वर्ष कविता कोश में हुई प्रगति पर एक संक्षिप्त आलेख तैयार किया गया है। इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। वर्षगांठ के अवसर पर कोश के लिये एक नया लोगो भी जारी किया गया है।

कविता कोश का नया लोगो
पिछले वर्ष में कविता कोश ने सभी पैमानों पर दुगुनी से अधिक प्रगति की है। इसका ब्यौरा आप आलेख में देख सकते हैं। आशा है कि तीसरे वर्ष के पूरे होने तक कविता कोश आज के इस मुकाम से कहीं आगे होगा।
प्रस्तुति
कविता कोश टीम
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June 30, 2008 by kavitakosh
कविता कोश टीम में दो बदलाव किये गये हैं। अब प्रतिष्ठा शर्मा कविता कोश की प्रशासक हैं और श्री अनिल जनविजय कोश के संपादक नियुक्त किये गये हैं। इसके अलावा श्री द्विजेन्द्र द्विज को टीम में सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। इसके अलावा टीम पहले की ही तरह है। शीघ्र ही, योगदान के आधार पर, कुछ और व्यक्तियों को सहयोगी सदस्य के रूप में टीम में शामिल किया जाएगा।
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June 28, 2008 by kavitakosh
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June 27, 2008 by kavitakosh
वली दक्कनी की १० और ग़ज़लें कविता कोश में जोड़ी गयी। इन उम्दा ग़ज़लों में दक्कन का लहज़ा आसानी से पहचाना जा सकता है। आशा है आपको ग़ज़लें पसंद आएंगी।
यदि आपके पास वली दक्कनी की और रचनाएँ हों तो कृपया कविता कोश टीम से सम्पर्क करें।
–सम्यक
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June 24, 2008 by pratishtha
डा. मृदुल कीर्ति द्वारा किये गये कठोपनिषद के हिन्दी काव्यानुवाद को अब कविता कोश में पढ़ा जा सकता है। कठोपनिषद नचिकेता के प्रति यम के उपदेश सम्बन्धी आख्यान के लिए प्रसिद्ध है । यह उपनिषद जीवन और मृत्यु के सत्य की विस्तृत व्याख्या करता है। यह उपनिषद बताता है कि जीवन मे यमराज का साक्षात्कार किये बिना भी साधारण जीव वैराग्य और विवेक तक कैसे पहुँच सकता है।
आशा है कि आपको ये काव्यानुवाद पसन्द आएंगे। अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत ज़रूर करायें।
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June 20, 2008 by kumarlalit
अंतरजाल पर हिन्दी काव्य का एक विशाल कोश देखने का सपना हम सभी के मन में था। आज यह कहा जा सकता है कि यह सपना सच हो चुका है। कविता कोश ने आज दस हज़ार पन्नों का आंकडा भी पार कर लिया। इन पन्नों में नौ हज़ार से भी अधिक हिन्दी काव्य रचनाएँ संकलित हैं। आप सभी को इस उपलब्धि के लिये हार्दिक शुभकामनाएँ।
आज भी मैं वही बात लिखना चाहूँगा -जो मैनें कोश में पाँच हज़ार पन्ने पूरे होने के समय इस ब्लॉग पर लिखी थी; कि
“सितारों के आगे जहाँ और भी हैं”
कविताओं के इस कोश को और भी अधिक विशाल और विविधता से भरपूर बनाने के प्रयास निरन्तर जारी रहेंगे। आप सभी को आपके सहयोग और शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद।
ललित कुमार
कविता कोश टीम
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June 19, 2008 by pratishtha
भारत, 18 जून 2008
समूचे भारत वर्ष में महात्मा कबीर जयन्ती के रूप में मनाया गया। कई प्रदेशों में तो आज सरकारी अवकाश भी रहा। ज़ाहिर है आज बहुत से समारोह भी आयोजित हुए हैं। लेकिन महात्मा कबीर किसी राज नेता की भांति वर्ष में केवल एक बार सरकारी स्तर पर याद करवा कर याद किए जाने वाली हस्ती नहीं हैं। उनकी वाणी तो हर श्वास के साथ हर क़दम पर याद आने वाली चीज़ है।
बहर—ए—हज़ज में महात्मा कबीर की यह ग़ज़ल पेश है जिसके लयखंड (अर्कान) (1222×4) हैं:
ह1 मन2 हैं2 इश2, क़1 मस2ता2ना2, ह1 मन2 को 2 हो 2, शि1 या2 री2 क्या2
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
साथ ही रसास्वादन कीजिए कबीर वाणी के और भी बहुत से अमृत का कविता कोश में।
शुभाकांक्षी
द्विजेन्द्र ‘द्विज’
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June 18, 2008 by pratishtha
हर दिल अज़ीज़ शायर वसीम बरेलवी को प्रथम चित्रांशी फ़िराक़ इन्टर नैशनल अवार्ड—२००८ के लिए कविता कोश टीम की ओर से हार्दिक बधाई।
अज़ीम शायर पद्मभूषण प्रो. रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी की स्मृति में स्थापित प्रथम फ़िराक़ इन्टर नैशनल अवार्ड—२००८ से सुप्रसिद्ध शायर वसीम बरेलवी को १६ जून ,२००८ को आगरा में सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह सूर सदन में आयोजित किया गया था। मुख्य अतिथि केन्द्रीय राज्य मन्त्री डा. शकील अहमद ने प्रो. वसीम बरेलवी शाल ओढ़ा कर सम्मानित किया तथा उन्हें इक्यावन हज़ार रुपये का चेक भेंट किया। उन्होंने कहा कि वसीम बरेलवी की शायरी हमारे देश की आत्मा है तथा भाषा और भाव को निराले अन्दाज़ में खीचने वाले इस शायर को बस सुनते ही चले जाने को जी चाहता है। चित्रांशी संस्था के अध्यक्ष के.सी. श्रीवास्तव ने कहा कि फ़िराक़ इन्टर नैशनल अवार्ड एक वर्ष हिन्दोस्तान के और दूसरे वर्ष हिन्दोस्तान के बाहर के शायर को प्रदान किया जाएगा।
अपने सीधे—सादे लेकिन जादू बुनते अल्फ़ाज़ में अपनी शायरी के साथ सुनने – पढ़ने वाले के दिल–ओ-दिमाग को पुरनूर कर देने वाले शायर वसीम बरेलवी को एक बार फिर से हार्दिक बधाई।
बरेलवी साहब का यह ख़ूबसूरत शे’र:
बात सुन ली है मगर सुन के हँसी आई है।
क़तरा कहता है समन्दर से शनासाई है।।
और जगजीत सिंह की आवाज़ में उनकी यह ग़ज़ल तो आपने सुनी ही होगी:
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले।
किताब—ए—माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
न जाने कौन—सा सफ़्हा मुड़ा हुआ निकले।
जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासिला निकले।
लीजिए कविता कोश में आज ही पढ़िये वसीम बरेलवी साहब की कुछ और ग़ज़लें।
शुभाकांक्षी
द्विजेन्द्र ‘द्विज’
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