पहली सितंबर को दुष्यंत कुमार को उनके जन्म दिवस पर याद करते हुए कविता कोश आपके लिए लाया है उनकी कालजयी ग़ज़लों के संकलन साये में धूप के साथ-साथ उनकी और भी बहुत-सी रचनायें।
ग़ज़ल जैसे फ़ारसी-उर्दू काव्य—रूप के प्रति हिन्दी में एकदम नया वातावरण तैयार कर,हिन्दी-ग़ज़ल को एक युगान्तर कारी काव्य-विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले दुष्यंत कुमार को भूल पाना जितना असंभव है , उनके जन्म दिवस पर उनका और भी याद आना भी उतना ही स्वाभाविक है। उनका ज़िक्र आते ही मानो अँधेरे में सैंकड़ों चराग़ों की मानिंद बरबस जगमगा उठते हैं उनकी ग़ज़लों के ऐसे बहुत —से शे`र:
कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार
रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं
अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर—ठिकाने आएँगे
हो गई है पीर —पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह
पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
यहाँ तक आते—आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह
ज़िन्दगी ने जब छुआ कुछ फ़ासला रख कर छुआ
मत कहो आकाश में कुहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से
मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोड़ा—सा हाशिया
यह उनके शे`रों के नगीनों, काव्य मोतियों की चमक , चराग़ों की रौशनी का चिर-स्थाई जादू है कि समय—समय पर अधिकांश शे`र ताज़ा मुहावरों की तरह आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग होते हैं और सूक्तियों, दोहों, व चौपाइयों की तरह, उद्धृत किये जाते हैं।
हिन्दी साहित्य के इस प्रकाशपुंज के चाहने वालों के लिये उनकी रचनायें आज भी ज़िन्दगी की कड़ी धूप में साये की तरह, और ‘जा तेरे स्वप्न बड़े हों’ जैसे आशीर्वाद की तरह हैं।
August 31, 2008 at 7:27 pm |
Dhanyawad Khooburat shr aur gazal ke liye.