फ़राज़ अहमद ‘फ़राज़’ साहब को आँ जहानी कहना एक बेइन्तिहा मुश्किल काम है। उनके प्रशसंक अगर उन्हें याद न करें तो भुलाएँ भी किस तरह? करोड़ों प्रशंसकों के दिलों और दिमाग़ों को अपनी खूबसूरत शायरी से पुरनूर रखने वाले ’फ़राज़’ साहब अब भले ही इस दुनिया को और अपने तमाम चाहने वालों को अलविदा कह गये हों, लेकिन उनके चाहने वालों की आँखों में उनकी यादों के जुगनू आँसू बन कर चमकते ही रहेंगे। अपनी शायरी के करोड़ों मुरीदों के दिलों में, दुनिया के बेहतरीन गायकों की आवाज़ों में, अपनी लासानी शायरी की किताबों में हमेशा तरो ताज़ा रहने वाले आशार के फूलों में और रहती दुनिया तक हर काव्य प्रेमी के ज़ेह्नो—दिल में ज़िंदा रहेंगे फ़राज़ साहब.
कविता कोश टीम दिवंगत आत्मा को अपने श्रद्धा—सुमन , भाव भीनी श्रद्धांजलि
अर्पित करती है.
फ़राज़ साहब के चंद आशार:
जब तिरी याद के जुगनू चमके
देर तक आँख में आँसू चमके
ऐसा गुम हूँ तिरी यादों के बियाबानों में
दिल न धड़के तो सुनाई नहीं देता कुछ भी
अब के हम बिछ्ड़ें तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
सो रहो मौत के पहलू में फ़राज़
नींद किस वक़्त न जाने आए
करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला
तुम तक़्क़लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला.
पाठक जब चाहें फ़राज़ साहब की अमर शायरी कविता कोश में पढ़ सकते हैं.
सादर
August 28, 2008 at 4:00 am
कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चालो
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो
ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़निमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो
अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो
तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है
“फ़राज़” तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो
August 28, 2008 at 12:15 pm
शायर अहमद फ़राज़ साहेब को श्रृद्धांजलि!!
August 28, 2008 at 12:55 pm
“dil bhii bujhaa ho shaam kii parachhaa_iyaa.N bhii ho.n
mar jaa_iye jo aise me.n tanhaa_iyaa.N bhii ho.n ”
kya khoob she’r hai faraz saheb ka.ek behad umda shayar the.
August 28, 2008 at 4:17 pm
ye sirf faraz sahib ka jana nahin hai, us pul ka tootna hai jo hind-o-pak ke avaam ko jodta tha. unhi ke sher main kahun to : phir isee rahguzar par shaayad, ham kabhi mil saken magar shaayad. aise log roz paida nahin hote. shair ke dil ko sambhalna badi quvvat ka kaam hai bhai. unhen naman.
August 31, 2008 at 12:12 pm
द्विज जी
अब के हम बिछ्ड़ें तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
और
रंजिश ही सही….जैसे सदा बहार शेर कहने वाले शायर को भला कौन भुला सकता है….ऐसे शायर, चाहने वालों के दिलों में हमेशा जिन्दा रहते हैं…खुदा उन्हें करवट करवट जन्नत नसीब करे…या फ़िर उस से भी ज्यादा अगर कुछ होता हो तो वो…
शुक्रगुजार हैं आप के द्विज भाई, आपने उन्हें पढने की इतनी उम्दा सहूलियत अता जो फरमाई है…
नीरज