इस बार, कविता कोश आपके लिए लाया है बहुत—सी अन्य कविताओं के साथ—साथ कुमार विकल की कविताएँ। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताओं के ये अंश :
…किन्तु आज जब बचपन अँधेरे कमरे में खोई सूई के समान है
अक्सर अधसोई रातों को
बिस्तर में अर्थहीन सोचा करता हूँ. बायस्कोप
…जब तक बहता है झरना
और मँडराती है
मेरे जिस्म के आसपास
एक पहाड़ी क़स्बे की गंध
मैं नहीं अकेला
मैं नहीं निस्संग. एक पहाड़ी यात्रा
…दुनिया का सबसे सुखी आदमी—
सुअर.
और दुखी जानवर
आदमी. शहर का नाम
…दुखी दिनों में आदमी
दिन की रौशनी में रोने के लिये अँधेरा ढूँढता है
और चालीस की उम्र में भी
माँ की गोद जैसी
कोई सुरक्षित जगह खोजता है. दुखी दिनों में
…मुझे लड़ना नहीं —
किसी प्रतीक के लिए
किसी नाम के लिए
किसी बड़े प्रोग्राम के लिए
मुझे लड़नी है एक छोटी—सी लड़ाई
छोटे लोगों के लिए
छोटी बातों के लिए. एक छोटी—सी लड़ाई
…ग़लती की शुरुआत यहीं से होती है
जब तुम उनके नज़दीक जाते हो
और कबाड़ी से ख़रीदे अपने कोट को
किसी विदेशी दोस्त का भेजा हुआ तोहफ़ा बतलाते हो. अगली ग़लती की शुरुआत
…आदमी की अरक्षा की भावना का
मूल स्रोत कहाँ है?
इसके बारे में आपको कोई मनोवैज्ञानिक
या समाजशास्त्री बेहतर बता सकता है.
कवि तो केवल
एक अरक्षित आदमी का बिंब पेश कर करता है. पुल पर आदमी
कुमार विकल की कविताओं के ये अंश पढ़कर, उनका पूरा कविता संग्रह एक छोटी—सी लड़ाई जो हाल ही में कविता कोश में जुड़ा है, आप एक ही साँस में पढ़ जाना चाहेंगे। दिलो—दिमाग़ को जकड़ लेने वाली उनकी जादुई कहन के लिए कविता कोश में आपका स्वागत है।
सादर
August 12, 2008 at 7:10 am |
किन्तु आज जब बचपन अँधेरे कमरे में खोई सूई के समान है
अक्सर अधसोई रातों को<<
दुखी दिनों में आदमी
दिन की रौशनी में रोने के लिये अँधेरा ढूँढता है<<
kya baat hai.
Dwij ji ka bahut shukria kumar vikal saheb ko is manch par lane ka.
thanks and regards
satpal khyaal
August 12, 2008 at 10:33 am |
choti jagiro ke dukh chote hote hain ……. ve jante hain ki nanga aadmi bahut khatarnak hota hai… vikal jee ki kavitaon ko schooli de padh raha hoon. padh kar us khoon ko pehchanne me bahut madad mili jo sadak par bikhra hota hai. vo kisi hindu ya musalmaan ka nahin hota. chayan bahut accha hai. please ve kavitayen bhi den jo kavita vishyak hain. jaise…Prabhu ji koi aisi yukti karo daas ko kavit mukt karo… ya…prbhu ji aap badi der se aaye, ab aapko kaun pilaye… thanks for this nutrition…meaningful feed.
navneet
August 31, 2008 at 12:18 pm |
यकीनन विलक्षण रचना है…एक एक शब्द गहरी से चोट करता है और मजबूर करता है सोचने के लिए…ऐसी रचना को एक साँस में नहीं पढ़ा जा सकता…घूँट घूँट पिया जाता है…आप का शुक्रिया इसे पढ़वाने के लिए…
नीरज
September 2, 2008 at 6:13 am |
Sab se ajha rasata hai
Dhanyabad
Rajendra Singh Kunwar Fariyadhi