लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है —मुनव्वर राना
हिन्दी काव्य के महासागर कविता कोश में पढ़िये सुपरिचित शायर मुनव्वर राना की पुस्तक माँ में संग्रहित के ये अप्रतिम शे’र :
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मैदान छोड़ देने से मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो यह ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई
‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती
इन सुन्दर शे`रों की अद्वितीय भाव-प्रवणता और भाव-सम्पन्नता की उद्दात लहरों का आकर्षण आपको इस काव्य कृति के सागर की गहराइयों में बार-बार डुबकी लगाकर ‘माँ’ पर विभिन्न काव्य मोती निकाल लाने को अवश्य विवश करेगा।
मुनव्वर राना साहब ने यह पुस्तक हर उस बेटे को समर्पित की है जिसे माँ याद है.
माँ के साथ बुज़ुर्ग, भाई, बहन, बेटी तथा और भी कई विषयों पर मुनव्वर राना के विभिन्न शे`रों का संकलन ‘माँ’ पढ़ने के लिए आइये चलें कविता कोश के महासागर में।
प्रस्तुति
July 12, 2008 at 1:42 pm |
नतमस्तक हूँ मुनव्वर जी के इन शेरों के आगे…माँ पर उनसे बेहतर उर्दू शायरी में और कहीं शेर देखने को नहीं मिलते. बिना थोथी भावुकता के वो ऐसे नायाब शेर निकालते हैं की तबियत बाग बाग हो जाती है… आँखें नम और मुंह से बरबस वाह वा…निकल पड़ती है. ये शेर जब वो अपने अंदाज़ में सुनते हैं तो देखते ही बनता है…मेरे पास एक मुशायरे की विडियो सी.डी. है जिसमें उन्होंने लगभग ये सभी शेर सुनाएँ है….
ऐसे बेमिसाल शायर को मेरा फर्शी सलाम.
नीरज
July 12, 2008 at 4:29 pm |
कुछ और भी है–
किसी को घर मिला हिस्से में या दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई..
जब भी कश्ती मेरी तूफान में आ जाती है..
मां दुआ करती हुई, ख्वाब में आ जाती है…
July 13, 2008 at 1:36 am |
मुनव्वर राना जी की बात जुदा है!! आभार इस प्रस्तुति का.
July 6, 2009 at 8:23 am |
bahut dil khush hooya achhi soch se