पन्नो की रजत जयंती :)

November 21, 2009 by pratishtha
कविता कोश की स्थापना को लगभग साढ़े तीन वर्ष हुए हैं। इतने कम समय में कोश हिन्दी सहित्य जगत में एक स्थापित तथा लोकप्रिय नाम बन चुका है। आज मुझे यह सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि अब कोश में उपलब्ध पन्नों की संख्या 25,000 के ऊपर पँहुच गयी है।  अभी कुछ ही देर पहले कोश ने यह मील का पत्थर पार किया। हर 5,000 रचनाओं के जुड़ने को कविता कोश में एक मील का पत्थर माना जाता रहा है। साढ़े तीन वर्ष के कम समय में 25,000 पन्नों का संकलन अपने आप में एक उपलब्धि है। अब कविता कोश के विषय में अधिक कुछ बताने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। यह हिन्दी काव्य का इंटरनेट पर उपलब्ध सबसे बड़ा कोश बन चुका है और इंटरनेट को प्रयोग करने वाले तकरीबन सभी हिन्दी काव्य प्रेमी इसके बारे में जानते हैं और इसका प्रयोग करते हैं।

इस पाँचवे मील (20,000 से 25,000 तक) को पार करने में  जिन योगदानकर्ताओं का सहयोग कविता कोश को मिला उनमें धर्मेन्द्र कुमार सिंह (Dkspoet), प्रकाश बादल और श्रद्धा जैन के नाम प्रमुख हैं। इनकें अलावा राजीव रंजन प्रसाद, अजय यादव और चंद्र मौलेश्वर जी ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। मैं इस अवसर उन सभी योगदानकर्ताओं को कविता कोश के सभी पाठकों की ओर से धन्यवाद देना चाहूँगी जिनके सहयोग से कोश यहाँ तक आ सका है। ऐसे योगदानकर्ताओं की सूची लम्बी है इसलिये मैं यहाँ सभी का नाम नहीं लूंगी। कविता कोश के विभिन्न पन्नों पर इन योगदानकर्ताओं के सहयोग की छाप आप प्रतिदिन ही देख पाते होंगे। जो लोग अभी तक इस परियोजना के विकास में सहयोग नहीं दे सकें हैं उनसे अनुरोध है कि आप भी इसमें योगदान करें। सामूहिक प्रयत्न के कारण ही हम सभी को कविता कोश जैसा संकलन आज सुलभ हुआ है।

ऐसे किसी भी अवसर पर कविता कोश के संस्थापक तथा कविता कोश टीम को नहीं भूला जा सकता। इस समय मैं कोश के संस्थापक श्री ललित कुमार जी और टीम के सभी वर्तमान और पूर्व सदस्यों को हार्दिक धन्यवाद देती हूँ। आपके मार्गदर्शन, श्रम और सहयोग के बिना कविता कोश इतना विकसित नहीं हो सकता था।

कविता कोश को और आगे बढ़ने के लिये निरन्तर नये योगदानकर्ताओं की आवश्यकता रहती है। आप सबसे अनुरोध है कि इस कार्य में आप भी हाथ बंटाये।

प्रतिष्ठा शर्मा
प्रशासक, कविता कोश टीम

हम हुए बीस हज़ारी!

July 22, 2009 by kavitakosh

आपको यह सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि कविता कोश में उपलब्ध पन्नों की संख्या अब 20,000 के ऊपर पँहुच गयी है। अभी दो सप्ताह पहले ही कोश की स्थापना के तीन वर्ष पूरे हुए हैं। इतने कम समय के दौरान 20,000 पन्नों का संकलन अपने आप में एक उपलब्धि है। यह उपलब्धि इसलिये भी विशेष है क्योंकि कोश में संकलित रचनाकारों का चयन एक कठिन प्रक्रिया के ज़रिये किया जाता है।

कविता कोश और हिन्दी विकिपीडिया का विकास अंतरजाल पर हिन्दी की उपस्थिति और लोगो के हिन्दी के प्रति प्रेम और लगन को दर्शाता है। यह दोनो ही परियोजनाएँ अब हिन्दी भाषा के परचम को अंतरजाल पर फ़हराने में अग्रणी हो चुकी हैं। दोनो ही परियोजनाएँ सामूहिक प्रयास द्वारा बड़े लक्ष्यों को प्राप्त कर लेने का उत्तम उदाहरण हैं।

बीस हज़ार पन्नों के आंकडे़ तक पँहुचने के इस अवसर पर कविता कोश अपने सभी योगदानकर्ताओं और कविता कोश टीम के सभी सदस्यों को धन्यवाद देता है। आप सभी की लगन और मेहनत रंग लाई है।

कविताओं के इस कोश को और भी अधिक विशाल और विविधता से भरपूर बनाने के हमारे प्रयास निरन्तर जारी रहेंगे।

आप सभी को आपके सहयोग और शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद।

प्रतिष्ठा शर्मा
प्रशासक, कविता कोश टीम

कविता कोश के तीन वर्ष

July 17, 2009 by pratishtha
कविता कोश आज तीन वर्ष का हो गया है। हिन्दी काव्य का यह ऑनलाइन कोश इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है सामूहिक प्रयासों द्वारा किसी भी कठिन और विशाल लक्ष्य को पाया जा सकता है। कविता कोश साहित्य के भविष्य का भी दर्पण है। इस कोश में संकलन के द्वारा ना केवल दुर्लभ और लुप्त होती कृतियों को बचाया जा रहा है बल्कि ये कृतियाँ सर्व-सुलभ भी हो रही हैं। रचनाकार कविता कोश में अपनी रचनाओं के संकलन के बाद संतुष्टि का अनुभव करते है कि उनकी रचनाएँ समस्त विश्व में पढी़ जा सकती हैं और सुरक्षित व सुसंकलित हैं। इस तीसरे वर्ष में भी कोश तीव्र गति से आगे बढा़। इसी प्रगति की संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है।
==आंकडो़ की नज़र से==
<table width=80% align=center cellpadding=6 style=”border:1px solid #c5c5c5; background-color:#f9f9f9″>
<tr bgcolor=”#c5c5c5″><td></td><td align=center>”’पहले वर्ष में”’</td><td align=center>”’दूसरे वर्ष में”’</td><td align=center>”’तीसरे वर्ष के अंत तक”’</td></tr>
<tr><td>”’संकलित रचनाकारों की संख्या”’</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>200</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>390</td>
<td bgcolor=”#e5e5e5″>”’980”’</td>
</tr>
<tr><td>”’कोश में उपलब्ध कुल पन्ने”’</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>3,000</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>>10,000</td>
<td bgcolor=”#e5e5e5″>”’~20,000”’</td>
</tr>
<tr><td>”’कोश के जालस्थल पर हर महीने आने वाले आगंतुकों की संख्या”’</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>5,000</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>>17,000</td>
<td bgcolor=”#e5e5e5″>”’>50,000”’</td>
</tr>
<tr><td>”’हर महीने देखे जाने वाले पन्नो की संख्या”’</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>70,000</td>
<td bgcolor=”#f0f0f0″>>200,000</td>
<td bgcolor=”#e5e5e5″>”’>700,000”’ (जून 2009)</td>
</tr>
</table>

कविता कोश पाँच जुलाई को तीन वर्ष का हो गया। हिन्दी काव्य का यह ऑनलाइन कोश इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है सामूहिक प्रयासों द्वारा किसी भी कठिन और विशाल लक्ष्य को पाया जा सकता है। कविता कोश साहित्य के भविष्य का भी दर्पण है। इस कोश में संकलन के द्वारा ना केवल दुर्लभ और लुप्त होती कृतियों को बचाया जा रहा है बल्कि ये कृतियाँ सर्व-सुलभ भी हो रही हैं। रचनाकार कविता कोश में अपनी रचनाओं के संकलन के बाद संतुष्टि का अनुभव करते है कि उनकी रचनाएँ समस्त विश्व में पढी़ जा सकती हैं और सुरक्षित व सुसंकलित हैं।

इस वर्ष कोश के विकास में हाथ बंटाने वाले कुछ प्रमुख योगदानकर्ता रहे – संपादक अनिल जनविजय जी, सदस्य द्विजेन्द्र ‘द्विज’ जी, हेमंत जोशी, श्रद्धा जैन, चंद्र मौलेश्वर, हिमांशु, राजुल मेहरोत्रा, विनय प्रजापति, एकलव्य, भारतभूषण तिवारी”’ और ऋषभ देव शर्मा

पिछले वर्ष कविता कोश में हुई प्रगति पर एक संक्षिप्त आलेख तैयार किया गया है। इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

प्रतिष्ठा शर्मा

प्रशासक, कविता कोश टीम

स्वागत है म्हारा सजन सनेही बल बल आया सा….

March 4, 2009 by pratishtha
मुझे आप सभी को यह सूचित करते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि प्रसिद्ध कवि श्री अशोक चक्रधर ने कविता कोश टीम का “मानद सदस्य” बनना स्वीकार कर लिया है। कविता कोश टीम माननीय अशोक जी  का तहे-दिल से स्वागत करती है। हम उम्मीद करते है कि आपका मार्ग-दर्शन कविता कोश को नई ऊँचाई देने में सहायक होगा।
 
 कविता कोश टीम ने कुछ समय पहले यह निर्णय लिया कि टीम में कुछ मानद सदस्यों को भी सम्मिलित किया जाएगा। मानद सदस्यता टीम द्वारा हिन्दी काव्य जगत के प्रतिष्ठित रचनाकारों को भेंट की जाएगी। इस तरह कविता कोश टीम को, कोश के विकास में, मानद सदस्यों के अनुभव से सहायता मिल सकेगी। 

 

प्रतिष्ठा शर्मा
प्रशासक, कविता कोश टीम

आल्हा … पढिये कविता कोश में!

February 3, 2009 by kavitakosh

आप में से बहुत से व्यक्तियों ने आल्हा रेडियो पर सुना होगा। जिस ऊर्जा और उत्साह के साथ आल्हा और ऊदल की वीर-गाथाओं को हमारे लोक-गायक गाते रहे हैं उससे इस छंद को सुनने का आनंद दूना हो जाता है।

बहुत समय से पाठकों की यह मांग रही है कि कविता कोश में आल्हा शामिल किया जाये। लेकिन यह छंद कहीं मिल नहीं रहा था। अब आखिरकार श्री योगेन्द्र सिंह के योगदान के कारण भोजपुरी में लिखे गये आल्हा का एक हिस्सा कोश में संकलित हो पाया है। सभी पाठकों की ओर से हम श्री योगेन्द्र सिंह को धन्यवाद देते हैं। इस आल्हा को पढने के लिये यहाँ क्लिक करें

श्री योगेन्द्र सिंह ने और भी ऐसी रचनाएँ भेजने के लिये कहा है। आप देख सकते हैं कि सभी के द्वारा थोड़ा-थोड़ा योगदान भी इस तरह की अनमोल और दुर्लभ रचनाओं को किस तरह खो जाने से बचा सकता है। आपसे अनुरोध है कि इसी भावना के तहत कविता कोश के विकास में सहायता करें।

कविता कोश टीम

एक और मील….

January 25, 2009 by pratishtha

आज हम एक और घोषणा के साथ आपके समक्ष उपस्थित हैं। हर 5,000 रचनाओं के जुड़ने को कविता कोश में एक मील का पत्थर माना जाता है। आज मुझे आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि कविता कोश ने इस तरह के तीन मील पार कर लिये हैं और अब कोश में 15,000 काव्य रचनाओं का एक विशाल संकलन निर्मित हो चुका है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अब कविता कोश अपने बालपन में नहीं रहा बल्कि अब यह यौवन की सुदृढ़ता को पा चुका है। कविता कोश एक लोकप्रिय कोश होने के साथ-साथ एक ऐसी परियोजना भी बन चुका है जिसकी ओर हिन्दी साहित्य जगत आशा और गर्व भरी निगाहों से देखता है।

मैं इस अवसर उन सभी योगदानकर्ताओं को कविता कोश के सभी पाठकों की ओर से धन्यवाद देना चाहूँगी जिनके सहयोग से कोश यहाँ तक आ सका है। ऐसे योगदानकर्ताओं की सूची काफ़ी लम्बी है इसलिये मैं यहाँ सभी का नाम नहीं लूंगी। कविता कोश के विभिन्न पन्नों पर इन योगदानकर्ताओं के सहयोग की छाप आप प्रतिदिन ही देख पाते होंगे। जो लोग अभी तक इस परियोजना के विकास में सहयोग नहीं दे सकें हैं उनसे अनुरोध है कि आप भी इसमें योगदान करें। सामूहिक प्रयत्न के कारण ही हम सभी को कविता कोश जैसा संकलन आज सुलभ हुआ है।

ऐसे किसी भी अवसर पर कविता कोश के संस्थापक तथा कविता कोश टीम को नहीं भूला जा सकता। इस समय मैं कोश के संस्थापक श्री ललित कुमार जी और टीम के सभी वर्तमान और पूर्व सदस्यों को हार्दिक धन्यवाद देती हूँ। आपके मार्गदर्शन, श्रम और सहयोग के बिना कविता कोश विकसित नहीं हो सकता था। टीम के वर्तमान सदस्यों श्री अनिल जनविजय जी, श्री द्विजेन्द्र द्विज जी, श्री अनूप भार्गव जी और श्री कुमार मुकुल जी ने इस तीसरे मील को पार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आप सभी को धन्यवाद।

जब आप मेरा यह संदेश पढ़ रहे होंगे तब तक कोश ने चौथे मील की राह पर चलना आरम्भ भी कर दिया होगा। आशा है कि जल्द ही मैं आपको यह चौथा मील भी पार कर लिये जाने की सूचना दूंगी।

प्रतिष्ठा शर्मा
प्रशासक, कविता कोश टीम

गुफ़्तगू अवाम से है

January 23, 2009 by kavitakosh

शेर मेरे हैं सभी ख़्वास पसंद

पर मुझे गुफ़्तगू अवाम से हैमीर

नये वर्ष में इस बार कविता कोश अन्य बहुत-सी रचनाओं के साथ-साथ, यथार्थ और कल्पनाशीलता, परम्परा और आधुनिकता का दुर्लभ संगम प्रस्तुत करते हुए ग़ज़ल को नया मुहावरा प्रदान करने और ग़ज़ल की अर्थवता की वृद्धि में अपना विशिष्ट योगदान देने वाले और सिर्फ़ उँगलियों पर गिनाए जा सकने वाले ग़ज़लकारों में अग्रणी ज्ञानप्रकाश विवेक की बहुत-सी ग़ज़लें जुटा लाया हैतग़ज़्ज़ुल और शेरियत के भरपूर फ़्लेवरों से युक्त उनकी ग़ज़लों के ये शेर देखिए :

वो कोई और नहीं दोस्तो ! अँधेरा है

दीया सिलाई जलाकर खड़ा है हँसता हुआ

पोस्टर सारे पुराने हो गये माहौल के

जाने कब बदली हुई आबो-हवा लाएँगे लोग

मोम की तार में अंगारे पिरो दूँ यारो

मैं भी कर गुज़रूँ कोई काम दिखाने वाला

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारो !

इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

हवाएँ पूछती फिरती हैं नन्हे बच्चों से

ये क्या हुआ कि पतंगें उड़ाना छोड़ दिया

पेश करते हैं दुख को शगल की तरह

चैनलों को न जाने ये क्या हो गया

अलमारी में रख आओ गये वक़्त की एलबम

जो बीत गया उसको भुला क्यों नहीं देते

ज्ञानप्रकाश विवेक की और भी बहुत-सी ग़ज़लें पढ़िए कविता कोश में हाल ही जुड़े  उनके ग़ज़ल संग्रह गुफ़्तगू अवाम से है में , अभी , इसी वक़्त।

नव वर्ष के लिए मंगल कामनों सहित

सादर

द्विजेन्द्र “द्विज”

जग-मग ज्योतिपर्व

October 28, 2008 by kavitakosh
कविता कोश की ओर से आपको, आपके परिवार और सभी मित्रगणों को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

पग-पग पे ‘तम’ को हरती हों दीप-श्रृंखलाएँ
जीवन हो  एक उत्सव,  पूरी हों कामनाएँ

आँगन में अल्पना की चित्रावली मुबारिक
फूलों की, फुलझड़ी की, शब्दावली मुबारिक

‘तम’ पर विजय की सुन्दर दृश्यावली मुबारिक
दीपावली मुबारिक, दीपावली मुबारिक

-द्विजेन्द्र द्विज

कविता कोश में सुरेश चन्द्र “शौक़” का ग़ज़ल संग्रह “आँच”

September 20, 2008 by kavitakosh

कविता कोश हमेशा आपके लिये उत्कृष्ट काव्य जुटाता रहा है। कविता कोश मे हाल ही में श्री सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ की ग़ज़लें संकलित हुई हैं।

‘तेरी खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे’ जैसी नज़्म के  सुप्रसिद्ध शायर श्री राजेन्द्र नाथ रहबर ने श्री सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ के ग़ज़ल संग्रह “आँच” की भूमिका में लिखा है :

” सुरेश चंद्र ‘शौक़’ साहिब की शायरी किसी फ़क़ीर द्वारा माँगी गई दुआ की तरह है जो हर हाल में क़बूल हो कर रहती है. ”

सुरेश चंद्र शौक़ साहिब के ये शेर देखिए :

ज़ियादा चुप ही रहे वो कभी— कभी बोले

मगर जो बोले तो ऐसे कि शाइरी बोले
इतने भी  तन्हा थे दिल के कब दरवाज़े

इक दस्तक को तरस रहे हैं अब दरवाज़े
शहर फूँकने वालो ! यह ख़याल भी रखना

दोस्तों के घर भी हैं दुश्मनों की बस्ती में
इस दौरे—सियासत में हर कोई ख़ुदा ठहरा

रखिए भी तो किस किस की दहलीज़ पे सर रखिए
तू वो न देख दिखाती है अक़्स जो दुनिया

तू देख वो जो दिखाता है आइना दिल का
आशा है आपको यह प्रस्तुति पसंद आएगी और आप इन ग़ज़लों का आनंद उठाएंगे।

द्विजेन्द्र द्विज

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

August 31, 2008 by kavitakosh

पहली सितंबर को दुष्यंत कुमार को उनके जन्म दिवस पर याद करते हुए कविता कोश आपके लिए लाया है उनकी कालजयी ग़ज़लों के संकलन साये में धूप के साथ-साथ उनकी और भी बहुत-सी रचनायें।

ग़ज़ल जैसे फ़ारसी-उर्दू काव्यरूप के प्रति हिन्दी में एकदम नया वातावरण तैयार कर,हिन्दी-ग़ज़ल को एक युगान्तर कारी काव्य-विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले दुष्यंत कुमार को भूल पाना जितना असंभव है , उनके जन्म दिवस पर उनका और भी याद आना भी उतना ही स्वाभाविक है। उनका ज़िक्र आते ही मानो अँधेरे में सैंकड़ों चराग़ों की मानिंद बरबस  जगमगा उठते हैं उनकी ग़ज़लों के ऐसे बहुत से शे`र:

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं

अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

हम घर में भटके हैं कैसे ठौरठिकाने आएँगे

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह

पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए

यहाँ  दरख़्तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

यहाँ तक आतेआते सूख जाती हैं कई नदियाँ

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह

ज़िन्दगी ने जब छुआ कुछ फ़ासला रख कर छुआ

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से

मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोड़ासा हाशिया

यह उनके शे`रों के नगीनों, काव्य मोतियों की चमक , चराग़ों की रौशनी का चिर-स्थाई जादू है कि समयसमय पर अधिकांश शे`र ताज़ा मुहावरों की तरह आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग होते हैं और सूक्तियों, दोहों, व चौपाइयों की तरह, उद्धृत किये जाते हैं।

हिन्दी साहित्य के इस  प्रकाशपुंज के चाहने वालों के लिये उनकी रचनायें आज भी ज़िन्दगी की कड़ी धूप में साये की तरह, और ‘जा तेरे स्वप्न बड़े हों’ जैसे आशीर्वाद की तरह हैं।

द्विजेन्द्र ’द्विज’