स्वागत है म्हारा सजन सनेही बल बल आया सा….

March 4, 2009 by pratishtha
मुझे आप सभी को यह सूचित करते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि प्रसिद्ध कवि श्री अशोक चक्रधर ने कविता कोश टीम का “मानद सदस्य” बनना स्वीकार कर लिया है। कविता कोश टीम माननीय अशोक जी  का तहे-दिल से स्वागत करती है। हम उम्मीद करते है कि आपका मार्ग-दर्शन कविता कोश को नई ऊँचाई देने में सहायक होगा।
 
 कविता कोश टीम ने कुछ समय पहले यह निर्णय लिया कि टीम में कुछ मानद सदस्यों को भी सम्मिलित किया जाएगा। मानद सदस्यता टीम द्वारा हिन्दी काव्य जगत के प्रतिष्ठित रचनाकारों को भेंट की जाएगी। इस तरह कविता कोश टीम को, कोश के विकास में, मानद सदस्यों के अनुभव से सहायता मिल सकेगी। 

 

प्रतिष्ठा शर्मा
प्रशासक, कविता कोश टीम

आल्हा … पढिये कविता कोश में!

February 3, 2009 by kavitakosh

आप में से बहुत से व्यक्तियों ने आल्हा रेडियो पर सुना होगा। जिस ऊर्जा और उत्साह के साथ आल्हा और ऊदल की वीर-गाथाओं को हमारे लोक-गायक गाते रहे हैं उससे इस छंद को सुनने का आनंद दूना हो जाता है।

बहुत समय से पाठकों की यह मांग रही है कि कविता कोश में आल्हा शामिल किया जाये। लेकिन यह छंद कहीं मिल नहीं रहा था। अब आखिरकार श्री योगेन्द्र सिंह के योगदान के कारण भोजपुरी में लिखे गये आल्हा का एक हिस्सा कोश में संकलित हो पाया है। सभी पाठकों की ओर से हम श्री योगेन्द्र सिंह को धन्यवाद देते हैं। इस आल्हा को पढने के लिये यहाँ क्लिक करें

श्री योगेन्द्र सिंह ने और भी ऐसी रचनाएँ भेजने के लिये कहा है। आप देख सकते हैं कि सभी के द्वारा थोड़ा-थोड़ा योगदान भी इस तरह की अनमोल और दुर्लभ रचनाओं को किस तरह खो जाने से बचा सकता है। आपसे अनुरोध है कि इसी भावना के तहत कविता कोश के विकास में सहायता करें।

कविता कोश टीम

एक और मील….

January 25, 2009 by pratishtha

आज हम एक और घोषणा के साथ आपके समक्ष उपस्थित हैं। हर 5,000 रचनाओं के जुड़ने को कविता कोश में एक मील का पत्थर माना जाता है। आज मुझे आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि कविता कोश ने इस तरह के तीन मील पार कर लिये हैं और अब कोश में 15,000 काव्य रचनाओं का एक विशाल संकलन निर्मित हो चुका है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अब कविता कोश अपने बालपन में नहीं रहा बल्कि अब यह यौवन की सुदृढ़ता को पा चुका है। कविता कोश एक लोकप्रिय कोश होने के साथ-साथ एक ऐसी परियोजना भी बन चुका है जिसकी ओर हिन्दी साहित्य जगत आशा और गर्व भरी निगाहों से देखता है।

मैं इस अवसर उन सभी योगदानकर्ताओं को कविता कोश के सभी पाठकों की ओर से धन्यवाद देना चाहूँगी जिनके सहयोग से कोश यहाँ तक आ सका है। ऐसे योगदानकर्ताओं की सूची काफ़ी लम्बी है इसलिये मैं यहाँ सभी का नाम नहीं लूंगी। कविता कोश के विभिन्न पन्नों पर इन योगदानकर्ताओं के सहयोग की छाप आप प्रतिदिन ही देख पाते होंगे। जो लोग अभी तक इस परियोजना के विकास में सहयोग नहीं दे सकें हैं उनसे अनुरोध है कि आप भी इसमें योगदान करें। सामूहिक प्रयत्न के कारण ही हम सभी को कविता कोश जैसा संकलन आज सुलभ हुआ है।

ऐसे किसी भी अवसर पर कविता कोश के संस्थापक तथा कविता कोश टीम को नहीं भूला जा सकता। इस समय मैं कोश के संस्थापक श्री ललित कुमार जी और टीम के सभी वर्तमान और पूर्व सदस्यों को हार्दिक धन्यवाद देती हूँ। आपके मार्गदर्शन, श्रम और सहयोग के बिना कविता कोश विकसित नहीं हो सकता था। टीम के वर्तमान सदस्यों श्री अनिल जनविजय जी, श्री द्विजेन्द्र द्विज जी, श्री अनूप भार्गव जी और श्री कुमार मुकुल जी ने इस तीसरे मील को पार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आप सभी को धन्यवाद।

जब आप मेरा यह संदेश पढ़ रहे होंगे तब तक कोश ने चौथे मील की राह पर चलना आरम्भ भी कर दिया होगा। आशा है कि जल्द ही मैं आपको यह चौथा मील भी पार कर लिये जाने की सूचना दूंगी।

प्रतिष्ठा शर्मा
प्रशासक, कविता कोश टीम

गुफ़्तगू अवाम से है

January 23, 2009 by kavitakosh

शेर मेरे हैं सभी ख़्वास पसंद

पर मुझे गुफ़्तगू अवाम से हैमीर

नये वर्ष में इस बार कविता कोश अन्य बहुत-सी रचनाओं के साथ-साथ, यथार्थ और कल्पनाशीलता, परम्परा और आधुनिकता का दुर्लभ संगम प्रस्तुत करते हुए ग़ज़ल को नया मुहावरा प्रदान करने और ग़ज़ल की अर्थवता की वृद्धि में अपना विशिष्ट योगदान देने वाले और सिर्फ़ उँगलियों पर गिनाए जा सकने वाले ग़ज़लकारों में अग्रणी ज्ञानप्रकाश विवेक की बहुत-सी ग़ज़लें जुटा लाया हैतग़ज़्ज़ुल और शेरियत के भरपूर फ़्लेवरों से युक्त उनकी ग़ज़लों के ये शेर देखिए :

वो कोई और नहीं दोस्तो ! अँधेरा है

दीया सिलाई जलाकर खड़ा है हँसता हुआ

पोस्टर सारे पुराने हो गये माहौल के

जाने कब बदली हुई आबो-हवा लाएँगे लोग

मोम की तार में अंगारे पिरो दूँ यारो

मैं भी कर गुज़रूँ कोई काम दिखाने वाला

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारो !

इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

हवाएँ पूछती फिरती हैं नन्हे बच्चों से

ये क्या हुआ कि पतंगें उड़ाना छोड़ दिया

पेश करते हैं दुख को शगल की तरह

चैनलों को न जाने ये क्या हो गया

अलमारी में रख आओ गये वक़्त की एलबम

जो बीत गया उसको भुला क्यों नहीं देते

ज्ञानप्रकाश विवेक की और भी बहुत-सी ग़ज़लें पढ़िए कविता कोश में हाल ही जुड़े  उनके ग़ज़ल संग्रह गुफ़्तगू अवाम से है में , अभी , इसी वक़्त।

नव वर्ष के लिए मंगल कामनों सहित

सादर

द्विजेन्द्र “द्विज”

जग-मग ज्योतिपर्व

October 28, 2008 by kavitakosh
कविता कोश की ओर से आपको, आपके परिवार और सभी मित्रगणों को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

पग-पग पे ‘तम’ को हरती हों दीप-श्रृंखलाएँ
जीवन हो  एक उत्सव,  पूरी हों कामनाएँ

आँगन में अल्पना की चित्रावली मुबारिक
फूलों की, फुलझड़ी की, शब्दावली मुबारिक

‘तम’ पर विजय की सुन्दर दृश्यावली मुबारिक
दीपावली मुबारिक, दीपावली मुबारिक

-द्विजेन्द्र द्विज

कविता कोश में सुरेश चन्द्र “शौक़” का ग़ज़ल संग्रह “आँच”

September 20, 2008 by kavitakosh

कविता कोश हमेशा आपके लिये उत्कृष्ट काव्य जुटाता रहा है। कविता कोश मे हाल ही में श्री सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ की ग़ज़लें संकलित हुई हैं।

‘तेरी खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे’ जैसी नज़्म के  सुप्रसिद्ध शायर श्री राजेन्द्र नाथ रहबर ने श्री सुरेश चन्द्र ‘शौक़’ के ग़ज़ल संग्रह “आँच” की भूमिका में लिखा है :

” सुरेश चंद्र ‘शौक़’ साहिब की शायरी किसी फ़क़ीर द्वारा माँगी गई दुआ की तरह है जो हर हाल में क़बूल हो कर रहती है. ”

सुरेश चंद्र शौक़ साहिब के ये शेर देखिए :

ज़ियादा चुप ही रहे वो कभी— कभी बोले

मगर जो बोले तो ऐसे कि शाइरी बोले
इतने भी  तन्हा थे दिल के कब दरवाज़े

इक दस्तक को तरस रहे हैं अब दरवाज़े
शहर फूँकने वालो ! यह ख़याल भी रखना

दोस्तों के घर भी हैं दुश्मनों की बस्ती में
इस दौरे—सियासत में हर कोई ख़ुदा ठहरा

रखिए भी तो किस किस की दहलीज़ पे सर रखिए
तू वो न देख दिखाती है अक़्स जो दुनिया

तू देख वो जो दिखाता है आइना दिल का
आशा है आपको यह प्रस्तुति पसंद आएगी और आप इन ग़ज़लों का आनंद उठाएंगे।

द्विजेन्द्र द्विज

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

August 31, 2008 by kavitakosh

पहली सितंबर को दुष्यंत कुमार को उनके जन्म दिवस पर याद करते हुए कविता कोश आपके लिए लाया है उनकी कालजयी ग़ज़लों के संकलन साये में धूप के साथ-साथ उनकी और भी बहुत-सी रचनायें।

ग़ज़ल जैसे फ़ारसी-उर्दू काव्यरूप के प्रति हिन्दी में एकदम नया वातावरण तैयार कर,हिन्दी-ग़ज़ल को एक युगान्तर कारी काव्य-विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले दुष्यंत कुमार को भूल पाना जितना असंभव है , उनके जन्म दिवस पर उनका और भी याद आना भी उतना ही स्वाभाविक है। उनका ज़िक्र आते ही मानो अँधेरे में सैंकड़ों चराग़ों की मानिंद बरबस  जगमगा उठते हैं उनकी ग़ज़लों के ऐसे बहुत से शे`र:

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं

अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

हम घर में भटके हैं कैसे ठौरठिकाने आएँगे

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह

पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए

यहाँ  दरख़्तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

यहाँ तक आतेआते सूख जाती हैं कई नदियाँ

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह

ज़िन्दगी ने जब छुआ कुछ फ़ासला रख कर छुआ

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से

मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोड़ासा हाशिया

यह उनके शे`रों के नगीनों, काव्य मोतियों की चमक , चराग़ों की रौशनी का चिर-स्थाई जादू है कि समयसमय पर अधिकांश शे`र ताज़ा मुहावरों की तरह आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग होते हैं और सूक्तियों, दोहों, व चौपाइयों की तरह, उद्धृत किये जाते हैं।

हिन्दी साहित्य के इस  प्रकाशपुंज के चाहने वालों के लिये उनकी रचनायें आज भी ज़िन्दगी की कड़ी धूप में साये की तरह, और ‘जा तेरे स्वप्न बड़े हों’ जैसे आशीर्वाद की तरह हैं।

द्विजेन्द्र ’द्विज’

ज़िंदा रहेंगे फ़राज़

August 28, 2008 by pratishtha

फ़राज़ अहमद ‘फ़राज़’ साहब को आँ जहानी कहना एक बेइन्तिहा मुश्किल काम है। उनके प्रशसंक अगर उन्हें याद न करें तो भुलाएँ भी किस तरह? करोड़ों प्रशंसकों के दिलों और दिमाग़ों को अपनी खूबसूरत शायरी से पुरनूर रखने वाले ’फ़राज़’ साहब अब भले ही इस दुनिया को और अपने तमाम चाहने वालों को अलविदा कह गये हों, लेकिन उनके चाहने वालों की आँखों में उनकी यादों के जुगनू आँसू बन कर चमकते ही रहेंगे। अपनी शायरी के करोड़ों मुरीदों के दिलों में, दुनिया के बेहतरीन गायकों की आवाज़ों में, अपनी लासानी शायरी की किताबों में हमेशा तरो ताज़ा रहने वाले आशार के फूलों में और रहती दुनिया तक हर काव्य प्रेमी के ज़ेह्नोदिल में ज़िंदा रहेंगे फ़राज़ साहब. 

कविता कोश टीम दिवंगत आत्मा को अपने श्रद्धासुमन , भाव भीनी श्रद्धांजलि

अर्पित करती है.  
 

फ़राज़ साहब के चंद आशार: 

जब तिरी याद के जुगनू चमके

देर तक आँख में आँसू चमके 

ऐसा गुम हूँ तिरी यादों के बियाबानों में

दिल न धड़के तो सुनाई नहीं देता कुछ भी

 

अब के हम बिछ्ड़ें तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें 

सो रहो मौत के पहलू में फ़राज़

नींद किस वक़्त न जाने आए 
 

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे

ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे 

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते

है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला 

तुम तक़्क़लुफ़ को  भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला. 

पाठक जब चाहें फ़राज़ साहब की अमर शायरी कविता कोश में पढ़ सकते हैं. 
 

सादर

द्विजेन्द्र ’द्विज’ 

एक छोटी—सी लड़ाई

August 10, 2008 by pratishtha

इस बार, कविता कोश आपके लिए लाया है बहुतसी अन्य कविताओं के साथसाथ कुमार विकल की कविताएँ। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताओं के ये अंश : 
 

…किन्तु आज जब बचपन अँधेरे कमरे में खोई सूई के समान है

अक्सर अधसोई रातों को

बिस्तर में अर्थहीन सोचा करता हूँ. बायस्कोप 

…जब तक बहता है झरना

और मँडराती है

मेरे जिस्म के आसपास

एक पहाड़ी क़स्बे की गंध

मैं  नहीं अकेला

मैं नहीं निस्संग. एक पहाड़ी यात्रा 

…दुनिया का सबसे सुखी आदमी

सुअर.

और दुखी जानवर

आदमी. शहर का नाम 
 

…दुखी दिनों में आदमी

दिन की रौशनी में रोने के लिये  अँधेरा ढूँढता है

और चालीस की उम्र में भी

माँ की गोद जैसी

कोई सुरक्षित जगह खोजता है. दुखी दिनों में 

…मुझे लड़ना नहीं

किसी प्रतीक के लिए

किसी नाम के लिए

किसी बड़े प्रोग्राम के लिए

मुझे लड़नी है एक छोटीसी लड़ाई

छोटे लोगों के लिए

छोटी बातों के लिए. एक छोटीसी लड़ाई 

 

…ग़लती की शुरुआत यहीं से होती है

जब तुम उनके नज़दीक जाते हो

और कबाड़ी से ख़रीदे अपने कोट को

किसी विदेशी दोस्त का भेजा हुआ तोहफ़ा बतलाते हो. अगली ग़लती की शुरुआत 

…आदमी की अरक्षा की भावना का

मूल स्रोत कहाँ है?

इसके बारे में आपको कोई मनोवैज्ञानिक

या समाजशास्त्री बेहतर बता सकता है.

कवि तो केवल

एक अरक्षित आदमी का बिंब पेश कर करता है. पुल पर आदमी 

कुमार विकल की कविताओं के ये अंश पढ़कर, उनका पूरा कविता संग्रह एक छोटीसी लड़ाई जो हाल ही में कविता कोश में जुड़ा है, आप एक ही साँस में पढ़ जाना चाहेंगे। दिलोदिमाग़ को जकड़ लेने वाली उनकी जादुई कहन के लिए कविता कोश में आपका स्वागत है।

सादर

द्विजेन्द्र ‘द्विज’

लिपट जाता हूँ माँ से — मुनव्वर राना

July 12, 2008 by kavitakosh

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है
मुनव्वर राना

हिन्दी काव्य के महासागर कविता कोश में पढ़िये सुपरिचित शायर मुनव्वर राना की पुस्तक माँ में संग्रहित के ये अप्रतिम शे’र :

घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

मैदान छोड़ देने से मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो यह ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई

‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती

इन सुन्दर शे`रों की अद्वितीय भाव-प्रवणता और भाव-सम्पन्नता की उद्दात लहरों का आकर्षण आपको इस काव्य कृति के सागर की गहराइयों में बार-बार डुबकी लगाकर ‘माँ’ पर विभिन्न  काव्य मोती निकाल लाने को अवश्य विवश करेगा।

मुनव्वर राना साहब ने यह पुस्तक हर उस बेटे को समर्पित की  है जिसे माँ याद है.

माँ के साथ बुज़ुर्ग, भाई, बहन, बेटी तथा और भी कई विषयों पर मुनव्वर राना के विभिन्न शे`रों का संकलन ‘माँ’ पढ़ने के लिए आइये चलें कविता कोश के महासागर में।

प्रस्तुति

द्विजेन्द्र द्विज